राईटर्स ब्लॉक

कभी कभी जब ज़िन्दगी टीवी सीरिअल बन जाती है
और राईटर्स ब्लॉक से जूझ रहा लेखक
एक अच्छे मोड़ के इंतज़ार में
यूं ही दिन रात कलम घिसता है
बीतते जाते हैं एपिसोड पर एपिसोड
दर्शक बोर हो जाते हैं और किरदार चिडचिडे
सौ बार दोहराए जाते हैं घिसे पिटे डायलॉग्स
कैमरा दोहराता है अलग अलग एंगल से
वही चेहरे वही एक्स्प्रेशंस
कुछ नया नहीं, कुछ बड़ा नहीं
और क्योंकि उधर राईटर रातें गला रहा है
तो हर लम्बे सीन के बाद ऐसा लगता है कुछ नया होगा
मगर बार बार टूटती है दर्शकों की उम्मीदें
और फिर हर बार ये ट्विस्ट रिपीट करता है खुद को
लेकिन नहीं आता कभी वो खूबसूरत मोड़
जिसका इंतज़ार है सबको
अब सवाल उठता है की लेखक कब हार माने
कब टूटे आख़िरी क्लाईमेक्स की उम्मीद
और कब ऐसा हो
कि एक दिन अचानक यूं ही चुपके से
कहानी खुद ही थककर सांस लेना बंद कर दे
और स्क्रीन पर दिखाई दे 'द एंड' का कार्ड.

डेढ़ चम्मच ख्वाब

जो ऐसा हो कि बारिश में हमारी रूह भीगी हो
और चाय की दरकार हो गरमागरम

इक अदरक की डली यादों सी कड़वी हो
तिरछी नज़र जितनी कोई इलाईची हो
कुछ डेढ़ चम्मच ख्वाब मीठा रंग लायें

भीगी हुई सीमेंट वाली बेंच भी हो
धूप में बूढ़े हुए से लाल रंग की
झुर्रियां धुलकर की जैसे चमक जाएँ

रास्ते भीगे हुए जो खीचते हों
कदम जिन पर फिसलते हों रुक न पाएं
धानी धुले पत्तों से आखें चौधियाएं

पेड़ की डाली से कुछ बूँदें गिरें
प्याले में बड़ी सोंधी सी इक खुशबू घुले
बचने की कोशिश हो की प्याला छलक जाए.

अक्स

वो ईसू नहीं था न ही उनका अनुयायी
उसने कभी एक थप्पड़ खाने पर
दूसरा गाल आगे नहीं किया
लेकिन दुनिया ने उसका दूसरा गाल ढूंढ लिया
उसने पहाड़ और झरने नहीं देखे थे
इसलिए वो हैरान हुआ
जब किसी ने उसकी आखों को
सूखे हुए झरने जैसा लिखा
वो अभी नवयुवक ही था
जब उसकी पीठ बूढों की तरह झुकने लगी
माथे की ज़मीन पर दरारें गहरा गयीं
और इन दरारों में उसकी तकदीर के पैर फसने लगे
वो कभी आस्तिक नहीं रहा था
लेकिन उसने
ईश्वर के न होने पर उतना ही अफ़सोस किया
जितना खुद के होने पर
एक बार बरसात के मौसम में
जब उसकी आखों में इन्द्रधनुष निकला
उसने अपने लिए लंबा जीवन मांग लिया
मगर फिर बादल हटे, धूप निकली
और इन्द्रधनुष के सारे रंग उड़ गए
घबराकर उसने अपनी घड़ी तेज करनी चाही
लेकिन घड़ी के सेल कमज़ोर हो चुके थे
उसे एक जीवन में कई सदियाँ जीनी पडीं
धीरे धीरे उसके आस पास के लोग बुत बनने लगे
और उसने पत्थरों के बीच जीना सीखा
जब उसने शीशा देखा
उसे लगा जैसे वो खुद भी पत्थर बन गया हो
उसने शीशा तोड़ना चाहा
मगर शीशा मजबूत था और उसका वार काफी गहरा
उसका अक्स सौ टुकड़ों में टूटकर बिखरा...!


मैं खुश हूँ

मैं खुश हूँ
मेरी आखों में पौधे हैं
पौधों में फूल हैं फूलों में कांटे हैं
खुशबू भी है, रंग भी हैं
सूरज हैं, उजाले हैं
चाँद हैं, तारे हैं
देखो मेरी आखों में सब कुछ है

तुम भी हो, देखो
पास आके देखो, करीब से, हाथ से छूके
ध्यान से छूना थोड़ी सी नमी भी है
पौधे हैं ना, नमी रखनी पड़ती है थोड़ी
वरना पौधे सूख जाते हैं ज़िंदगी की तरह
या फिर नागफनी बन जाते हैं दुनिया की तरह
तुम्हें दोनों पसंद नहीं हैं न मेरी तरह
तो मैंने कहा, तुम भी हो मेरी आखों में
चाहो तो छूके देखो कभी खुद को
शायद कुछ नया मिले
कुछ अनछुआ मिले सपनों की तरह
देखो ये मेरी आखों वाला उजाला कैसा है
ये सपनों वाला सूरज अच्छा है ना
देख लो ध्यान से, पता नहीं कब डूब जाए
कोइ डूबा हुआ सूरज उगा नहीं पाया कभी
चाँद में देखनी पड़ती है उसकी परछाईं
तुम्हें परछाईं देखना पसंद है न
शीशे में, पानी में, आखों में
नज़रों में, लफ़्ज़ों में, बातों में
इन सबमें कुछ है इश्वर की तरह
अनदेखा अनछुआ
अरे हाँ,
तुम भी इश्वर को नहीं मानती ना
मेरी तरह !

राक्षसों की आखें

जब मैं एक बुरे ख्वाब में अपने ख़्वाबों की फसल रौंदता हुआ गुज़रता हूँ
मेरी आखें एकदम खाली हो जाती हैं
गर्मियों की दोपहर जैसी
उसके बाद मेरी आखें उस कहानी राक्षस के जैसी हो जाती हैं
जो मैं बचपन से सुनता आया था
वो राक्षस बुरा नहीं था, जैसा कि मैं बचपन से समझता था
राक्षसों की आखें भी बुरी नहीं होतीं
उनकी आखें खाली होती हैं
उनके ख्वाब रौंद दिए जाते हैं
गर्मी की एक दोपहर में
और फिर सारे मौसम सूखे में बदल जाते हैं
फिर जब कभी पानी बरसता है तो राक्षस उसमें अपना चेहरा देखते हैं
चेहरे में उन्हें बस आखें दिखाई देती हैं
एकदम खाली और वीरान आखें
और सारी बरसात एक लम्बे और वीरान सूखे में बदल जाती है
नागफनी की तरह
बादलों के काटें निकल आते हैं
फिर उनसे पानी नहीं आग बरसती है
जिससे भीगने के अलावा कोई चारा नहीं होता उन राक्षसों के पास
फिर बाकी मौसम राक्षस उँगलियों पर अपनी बची हुई उम्र गिनते गुजारते हैं
कभी कभी उनकी उँगलियों पर भी कांटे उग आते हैं
राक्षस अपनी उगंली काट देना चाहते हैं
फिर उन्हें याद आता है कि इनसे उन्होंने तारे गिने थे
उन्हें कांटे तारों जैसे दिखने लगते हैं
वो तारों को चूमते हैं और अपने होठ काट लेते हैं
होठ काटने पर राक्षस दुखी नहीं होते
वो हँसते हैं
दुनिया उन्हें हसते हुए याद रखती हैं
हा..हा...हा...हा...!!!

जन्मदिन पर

कैलेण्डर तुमने मेरी कहानी गिनती में कह दी है
बिना शब्दों के एकदम सिम्बोलिक तरीके से
सफ़र में माईल स्टोन बना दिए हैं
अलग अलग पार्ट, अलग अलग चैप्टर
जैसे पढ़ना आसान करने के लिए किसी ने
पैराग्राफ बाँट दिए हों किसी लम्बी चिट्ठी में
अब जब तुम्हारे एक और पन्ने को पलट कर आज
मैं दिसंबर वाले पन्ने के थोड़ा और नजदीक पहुच गया हूँ
लगता है जैसे इन पन्नों में पुरानापन आने लगा है
उसी पुरानी डिजाइन ने बोर कर दिया है
अब चमक गायब है पहले जैसी नयी प्रिंटिंग वाली
वो खुशबू भी नहीं आती जो जनवरी में आती थी कागज और सियाही की
धूल ज़्यादा महकती है अब तुमसे
एक टेक्स्चर सा आ गया है धूप सहते सहते
तुम्हारे मुड़े कोने वाले पन्नों पर मैं अपने माथे जैसी लकीरे देखता हूँ
जो हर पन्ने के पलटने के साथ चौड़ी होती जाती हैं
कभी कभी मैं तुम्हारे ऊपर छपी डिजिट्स भूलकर
इन्हीं चौड़ी लकीरों में खो जाता हूँ
और देखता हूँ कि कैसे ये लकीरें हाथ की लकीरों की तरह
तुम पर छपी ढेरों डिजिट्स से होकर गुजरती हैं
और बुन देती हैं उनके बीच एक रहस्यमयी मकडजाल
जिनके बीच फसा हुआ मैं आगे के पन्नों तक पूरा पूरा नहीं पहुच पाता
और इसीलिये पीछे पलटे हुए तुम्हारे पन्नों में
दफन होता रहता हूँ थोड़ा थोड़ा पन्ना दर पन्ना
और आज जब तुम्हारा एक और पन्ना पलट रहा हूँ
मैं हैरान हूँ कि पहले तुम्हारे पन्ने ख़त्म होंगे या मैं ?

शून्य

शब्द शून्य, शून्य दृष्टी
शून्य व्यक्ति, शून्य सृष्टि
शून्य की विमा हज़ार
शून्य में गति अपार
शोर शून्य, शून्य शांति
शून्य सत्य, शून्य भ्रान्ति
शून्य आदि, शून्य अंत
शून्य में छिपा अनंत
सब विचार मिलके शून्य
सब प्रकाश मिलके शून्य
शून्य, जबकि कुछ नहीं है
शून्य, जबकि सब यहीं है
ध्यान के क्षणों में शून्य
प्रेम के पलों में शून्य
शून्य, जिसकी हर विधा है
शून्य, जिसमे हर दिशा है
नींद शून्य स्वप्न शून्य
जन्म शून्य मृत्यु शून्य
मुझमें शून्य तुझमे शून्य
सर्व शकित्मान शून्य

दुनिया की खिड़की

थक गया हूँ खिड़की पर बैठे बैठे
दूरबीन लिए कब तक यूं ही दुनिया देखूं
सभी झूठे हैं यहाँ मेरी तरह मैं जान गया
बुनते रहते हैं नए बहाने हर दिन
युगों सी ज़िंदगी बिताने के लिए
मौत के कुछ और करीब जाने के लिए

तो क्यों न हम अब शून्य के उस पार चलें
आकाश के दुसरे छोर तक
ठहरी हुई ऊबन से कोसों दूर
जहां कुछ भी थकाऊ नहीं
कुछ भी निभाऊ नहीं
जहां जिदगी आज में रहती हो
जहां अखबार न छपते हों
तारीख न हो, घड़ियाँ भी नहीं
उदासी न हो, सपने भी नहीं
न ही इंतज़ार कोइ सपनों के सच होने का
बस खुशी हो थोड़ी सी
बहुत थोड़ी सी
बस जो काफी हो एक पल को भर देने के लिए
और न कहीं दुसरे पल की आहट ही हो
ये साली ज़िन्दगी तो जन्मों सी लम्बी लगती है
ठहरी हुई सी सुस्त सी अलसाई सी
ये हर दिन का बुढाना यूं ही बैठे बैठे
और इंतज़ार साँसों की नदी थमने का
बहुत मुश्किल है, अब ये और न होगा हमसे
चलो कोई और राह चुनते हैं
ये तुम सम्हालो अपनी दूरबीन
ये खिड़की बंद कर लो अब
कि दुनिया झूठी है
रखो तहाके अपने कागजात
तारीख बावली है हमेशा से और अंधी भी
हमें परवाह नहीं, लिखने दो जो भी लिखती हो
हमारी धडकनें ही दास्तान हैं सच्ची
हमारे दिल में है एक कम्पास हमारा अपना.

यूं ही फिसलेगी ज़िंदगी तुम्हारे हाथों से

यूं ही फिसलेगी ज़िन्दगी तुम्हारे हाथों से
कदम दर कदम बदलेंगी तसवीरें
बेतरतीब बे सुर ताल हाथ छूटेंगे
कविताएं खुदकुशी करके कहानियाँ बन जायेंगी
और फिर ख़्वाबों में आयेंगी बची हुई उम्र भर
ख्वाब डरावने होते जायेंगे रात दर रात
लेकिन क्योंकि तुम इंसान हो
हर बार उठोगे ख़्वाबों को बीच में तोड़
और फिर से नयी तसवीरें बनाओगे मुस्कुराती हुई
लेकिन इस बार ये मुस्कराहट फूलों जैसी नहीं होगी
रंग भी इन्द्रधनुष वाले नहीं होंगे
दुनिया के लिए तुम्हारी तस्वीर एक पहेली बनती जायेगी
और तुम्हारे लिए इन्द्रधनुष
दुनिया की याददाश्त कमज़ोर है
पर तुम जानबूझकर भी ये भुला नहीं पाओगे
आखिर तुम इंसान जो हो
और फिर कस्तूरी वाले हिरन की तरह
तुम्हें भटकना होगा रंगों की तलाश में
सन्नाटे, उदासी भरे घनघोर जंगल में
निहायत अकेले.

उसकी आखें काली नहीं हैं !

उसकी आखें काली नहीं भूरी हैं
लेकिन आखों के आगे और पीछे दोनों ओर है गहरा काला रंग
डामर की तरह गर्म और चिपकता हुआ
जो अमादा है ज़ल्द से जल्द आँख को पूरी तरह ढक लेने पर
ठंडा भी नहीं होता जमता भी नहीं
बस पिघला हुआ है कींचड़ जैसा
जिस पर फसी हुई सी हैं उसकी दो आखें
कभी जलती हुई कभी फिसलती हुई कभी जमती हुई
जलते जलते आखें चटख गयी हैं भीतर भीतर
निशान पड़ गए हैं गहरे
जिनमे भरता जा रहा है डामर जैसा काला रंग
भीतर तक चला जाता है
और उसकी आखें खाईं जैसी होती जाती हैं
गहरी और अंधेरी
ब्लैकहोल की तरह
जिनमे एक एक कर डूबते जाते हैं
उसके सारे सपने
और हाँ, उसकी आखें काली नहीं हैं.

सच ! आकाश बहुत ऊंचा था

सच ! आकाश बहुत ऊंचा था
गिरा जो परसों, दबे-मरे सब
कई सपने तो पैरों में थे
कूड़ाघर पर गिरे थे तारे
बदबू और सडन में लथपथ
सूरज का कुछ पता नहीं है
गुमशुदगी के पर्चे चिपके
देखे थे कल चौराहे पर
कहते हैं अब नहीं मिलेगा
छोड़के सबकुछ चला गया है
दूर पहाड़ों पर रहता है
बारिश में भीगा करता है
सारी जलन मिटा लेगा अब
लौट के भी फिर क्या करना है
आकाश बिना वो कहाँ रहेगा
कहाँ से बाटेगा उजियारा
सबके घर में बल्ब लगे हैं
अब उसका कुछ काम नहीं है
अब सबकी छत आसमान हैं
बल्ब बने हैं तारा मंडल
सरकारें सूरज टाँगेंगी
सुना है ठेके उठा रही हैं.

इक छोटा सा सपना हूँ मैं

इक छोटा सा सपना हूँ मैं
गलती से आया हूँ शायद
बिना बुलाये बिना पुकारे
रस्ता भूल गया हूँ जैसे
कभी अचानक जब टूटुंगा
उस पल तक ही मौजूं हूँ बस
फिर मेरा कोई नाम नहीं है.

काश कि..

काश कि मैं इक शायर होता
लिखता आंसू की सियाही से
दर्द भरी कुछ नज्में और मैं
कह देता हाले दिल अपना
सियाही सब खाली कर देता

काश कि मैं इक बादल होता
खूब गरजता खूब बरसता
बूँद बूँद कर खूब बिखरता
गली सड़क नदियों नालों में
जब तक ख़त्म नहीं होता खुद

काश कि मैं बस इक दिन होता
सूरज के संग उगता फिर मैं
धूप में जलता शाम में ढलता
ज़ल्दी से बूढा हो जाता
रात अंधेरी कब्र में सोता.

कभी सुना है आपने

कभी सुना है आपने
किसी शायर का खुद ही एक ग़ज़ल बन जाना
बिना काफिये की बिना रद्दीफ़ की
बिना लफ़्ज़ों की बिना बातों की
जो न पढ़ी जा सके न सुनी जा सके
हल्की फुल्की सी, हवा में तैरती रहे
जिसे महसूस करना भी आसान न हो
बस बिखरी रहे यहाँ वहां जर्रे-जर्रे में, लम्हे-लम्हे में
बस बहती रहे बेसाख्ता सांसों की तरह
न कोई वज़ह हो न कोई असर
बस कभी छू के निकल जाये आपको यूं ही कुहासे की तरह
और छोड़ जाए कुछ ठंडी ठंडी सी बूँदें
और एक ठिठुरता हुआ सा एहसास
जो जिस्म की ढाल चीरकर सीधे रूह में उतर जाये
और फिर क्या पता आप भी एक ग़ज़ल बन जाएँ
बिना काफिये की, बिना रद्दीफ़ की
हल्की फुल्की सी, हवा में तैरने वाली...

इल्यूजन

राख पर छपे हुए क़दमों के निशान
पास जाकर देखने में डर लगता है 
अजीब सी घबराहट होती है
दूर से निहारा करता हूँ सहमा हुआ सा
गला सूखने लगता है बिना बोले ही
आखें कुछ देखना नहीं चाहतीं
भ्रमित होकर चौड़ी हो गयी हैं
कभी राख दिखती है, कभी आग, कभी घर
सब एक साथ, एक ही बार में
राख में पडी सारी अधजली घड़ियाँ अलग अलग समय दिखाती हैं
उनकी सुइयों से टकरा कर गिर पड़ता हूँ
फिर सारी ताकत लगाकर उठने की कोशिश करता हूँ
सर घूम रहा है, सब कुछ लूप में है
बार बार उठने की कोशिश, बार बार गिरना
अद्भुत इल्यूशन है 
और इस सारी गति के बीच मैं एकदम स्थिर हूँ
भ्रमित और हैरान
डायरी में मैंने जवाब लिखे थे कुछ सवालों के
अब पलटकर देखता हूँ 
तो क्वैश्चन मार्क लग गया है सबके आगे 
सारे जवाब सवाल बन गए हैं
घबराकर डायरी फेक देता हूँ
ख़याल आता है इल्यूजन है, टूटेगा थोड़ी देर में
फिर सोचता हूँ, इल्यूजन तो टूट चुका है.

...तो कैसा हो?

उलटा लटका तारों से मैं दुनिया देखूं तो कैसा हो
सपनों की रस्सी लटका कर झूला झूलूँ तो कैसा हो

बीते कल को आज में घोलूँ
पीकर मैं आकाश में डोलूँ
जूते गिर जाएँ जो मेरे, चल ना पाऊँ तो कैसा हो

अपना ही कार्टून बनाऊँ
जीभ निकालूँ उसे चिढ़ाऊं
हँसते हँसते गिर जाऊं फिर, उठ ना पाऊँ तो कैसा हो.....

कप में आंसूं भरके रखूँ
किस्से यादें चुनके रखूँ
सारे बीते गुज़रे लम्हे, वापस लाऊँ तो कैसा हो

क्या तुम मेरे गीत सुनोगे
ख़्वाबों का संगीत सुनोगे
आखों से छेड़ूँ मैं स्वर, तुम सुन ना पाओ तो कैसा हो.

तुम तो क्रान्ति लाने निकले थे ना


तुम तो क्रान्ति लाने निकले थे
खाली हाथ वापस आ गए
नहीं मिली क्या
मुझे पता है तुम कहोगे
कि तुमने पूरी कोशिश की
लेकिन सब सो रहे थे
तो भाई जगाते लोगों को
क्रान्ति लाने की तो बड़ी बात करते थे
फिर वही बात
अब तुम कह रहे हो कि
वो बुरा मान रहे थे जगाने पर
तो तुमने क्या सोचा था
तुमसे खुश होंगे
आरती उतारेंगे
अरे सोते हुए आदमी को जगाओगे
तो गाली ही खाओगे
और गाली से डर जाओगे तो क्रान्ति कैसे लाओगे
नारे तो खूब लगाते थे
लाठी गोली खायेंगे
देश को बचायेंगे
गोली तो क्या गाली भी नहीं खा पाए ढंग से
डरपोक साले
बहादुर बने फिरते हो
अरे लाठी गोली दूर की बात है
पहले जाओ गाली खाओ
लोगों को जगाओ
तुम सुबह के मुर्गे हो
तुम्हारे बोलने से ही लोग जानेंगे सुबह हुई है
उनके घर बंद हैं ना छतों से
काले रंग की छतें हैं सदियों पुरानी
खिड़कियाँ और रोशनदान भी तो नहीं हैं
उनके गुफा जैसे घरों में
ऐसे तो उजाला जाएगा नहीं
तुम्हे ही ले के जाना पडेगा
अपने हाथों से
अब तुम कहोगे तुम्हे घुसने ही नहीं देते हैं भीतर
तो जाओ बाहर से ही बांग दो ना
मुर्गा भी एक एक के घर थोड़ी जाता है
या तो एक काम करो यार
कलम ले आओ
उसमे रोशनी भर लो सूरज की
फिर उससे चिट्ठियां लिख कर भेजा करो
सबके घर में
देखना थोड़ा थोड़ा उजाला पहुच जाएगा
उनके अँधेरे घरों में
कुछ लोग तो जागेंगे
अरे डिस्टर्ब होंगे, करवट लेंगे
तुम पर चिल्लायेंगे
तो क्या नींद न टूटेगी इससे
ज़रूर टूटेगी, ज़रूर जागेंगे
रोशनी में बड़ा आकर्षण है
सुबह बला की खूबसूरत है, ताज़ी है, कमसिन है
बाकी काम वो खुद कर देगी
पर ज़ल्दबाज़ी न करना
डरना भी नहीं
हिम्मत तो बिलकुल नहीं हारनी है
क्रांति लानी है ना
कि ऐसे ही जियोगे हमेशा
और अकेले ही जागोगे तो बोर न हो जाओगे
फिर थोड़ी देर में तुम्हे भी नींद आ जायेगी.

फिर उगेगी रोशनी

देखना फिर उगेगी रोशनी अंधेरे दरिया में से
जब हालातों की टक्कर से निकली चिंगारी
उम्मीदों के सूखे हुए ढेर में जा गिरेगी
और मातमी लहरों को चीरकर
अपने लाल पंखों से उड़ पड़ेगी आकाश की ओर
उमंग और जोश की एक चीख तोड़ देगी
सदियों से पसरा सन्नाटा
एक साथ टूटेंगी सारी जंग लगी सलाखें
आशाएं नाच उठेंगी
मरे हुए लोग अचानक फिर से जी उठेंगेअपनी खुशी से चौंधियाई आखों से
दुनिया को अचरज से देखेंगे
और वो जो सुबह के इंतज़ार में रात भर जागे थे
एक दुसरे को बाँहों में भर कर झूमने लगेंगे
उनकी आखों से नींद और थकान बह निकलेगी
और प्रकाश फिर उन उल्लासित आखों में
ख़्वाबों के बीज बो देगा.

बस तुम हो और मैं हूँ...

बस तुम हो और मैं हूँ
किस्से हों बातें हों यादें हों
थोड़ी खुशबुएँ, थोड़ी खुशियाँ, थोड़े सपने, थोड़ी रोशनी हो
सब थोड़ा थोड़ा
थोड़ी कहानियाँ हों
छोटे छोटे चुटकुले हो जायें
थोड़ी सी 'देर सुबह' की धुप भी हो
सब कुछ शांत हो, एक दम ठहरा हुआ
फिर पत्तों से कुछ आवाजें आयें
हमारे चलने की
तुम्हारी हंसी भी होनी चाहिए
हमारे आसपास सपने टंगे हों
एकदम ताज़े ताज़े
तुम हो जाओ और मैं हो जाऊं
बस और क्या
चाय मंगा लेंगे दो कप.

एक क्रांतिकथा

उनकी ज़िंदगी मौत से बदतर हो चली थी
हवायें ज़हरीली थीं
हर सांस के साथ थोड़ी थोड़ी मौत उतर जाती थी सीनों में
उनकी दुनिया अंधेरी थी
सूरज थक कर सो गया था आसमान में कहीं
बुजुर्गों की कहानियों में उन्होंने उजाले के बारे में सुना था
उन्होंने आज़ादी के बारे में भी सुना था
उन्होंने सपनों का नाम भी सुना था
बस नाम सुने थे, किस्से सुने थे
पता नहीं सच्चे थे या झूठे
उन्हें भगवान पर विश्वास था
क्योंकि वो खुद न तो कुछ करते थे
ना ही कर सकते थे
उनकी हर सफलता और असफलता के लिए
ईश्वर ही ज़िम्मेदार था

एक दिन जब वो अपनी बदकिस्मती, डर
और निराशा से बोर हो गए थे
किसी ने उन्हें क्रान्ति के बारे में बताया
उन्हें शुरुआत में अजीब लगा फिर
बच्चों के उकसाने पर कुछ लोग खड़े हो गए
उन्होंने सर पर कफ़न बाँध लिए
और दुश्मन को पराजित करने निकल पड़े

दुश्मन को ढूंढते ढूंढते वो
नदियाँ, सागर, पहाड़, रेगिस्तान सब पार कर गए
वो कभी हवा में तलवारे चलाते थे, कभी पत्थरों पर
कभी सागर की लहरों के टुकड़े करने की कोशिश करते थे
वो थके बिना आगे बढते जाते थे
और चीखकर इन्कलाब के नारे लगाते थे
उनका ईश्वर उनकी हालत देखकर चकित था

जब वो भारी क्रोध, आक्रोश और बदले की भावना से भरे
अपने दुश्मन को ढूंढ रहे थे,
उन्हें एक गुफा का पता मिला
वो एक गहरी गुफा में घुसे
ये गुफा बाहर की दुनिया से भी ज्यादा अंधेरी थी
कहीं ज्यादा डरावनी और भयावह
वो तलवारें और भाले चलाते भीतर घुसते गए
गुफा में कोई नहीं था सन्नाटे और अँधेरे के सिवा
वो इन्कलाब के नारे लगाते भीतर चले जाते थे

उन्होंने सुना था कि इसके भीतर ही रहता है उनका दुश्मन
जिसने कैद कर रखा है उनका सूरज, उनके सपने
उनकी आशाएँ उनकी आज़ादी
यहाँ तक पहुचते कई मर चुके थे
भूख से, प्यास से, निराशा से, डर से
और साथी क्रांतिकारियों के अँधेरे में चल रहे बर्छियों और भालों से
जो बचे थे एक दुसरे का हाथ थामे आगे बढते जा रहे थे
वो भी वापस लौट गए होते
लेकिन उन्हें पता था कि इतना दूर आने के बाद
अब वो घर नहीं लौट पायेंगे

वो अपने थके बुझे क़दमों से आगे बढते गए
गुफा सदियों लंबी प्रतीत होती थी
कहीं दूर दूर तक ओर छोर नहीं दिखता था
उनके मन में पीछे छूट गए अपने देश की
अपने परिवार की यादें थीं
इस निराशा, क्षोभ और साथी क्रांतिकारियों की मौत ने
उनका गुस्सा और बढ़ा दिया था
उनकी आखें अंगारों सी दहकने लगी थीं
अब उन्हें कोई डर न था
खोने के लिए भी कुछ नहीं बचा था

तभी सामने से उजाले का कुछ आभास हुआ
वो समझ गए थे कि गुफा का अंत निकट है
यानी दुश्मन अब पास था
अपने हथियार सम्हाल वो विद्युत गति से दौड पड़े
उनके जूतों के नीचे से चिंगारियां निकलीं
गुफा उन मुठ्ठी भर वीरों की कदम ताल से गूँज उठी
फिर से इन्कलाब के नारे लगे और धरती हिल पडी

लेकिन जैसे ही वो गुफा के सिरे पर पहुचे
उनके पैरों ताले जमीन खिसक गयी
गुफा के अंत में आईने लगे थे
जिन पर उन्ही का अक्स झिलमिला रहा था
वो हैरान थे क्या करें, दुश्मन सामने था
जिसे समाप्त करने के लिए उन्होंने ये लंबी यात्रा की थी
अपने देश, अपने परिवार को खो दिया था
उनके ढेरों साथी रास्ते में ही बलि चढ गए थे
इतना सब खोकर खाली हाथ कैसे लौट सकते थे
पर वो विस्मित थे कि किस पर हमला करें
आइनों पर या खुद पर

फैसला आसान था
उन्होंने आईने तोड़ दिए
और दुश्मन की मौत का जश्न मनाते हुए वापस लौट आये.