गुमशुदा

न तुम जो सोचते हो, न मैं जो सोचता हूँ
मैं कौन हूँ, कहाँ हूँ, हर रोज़ खोजता हूँ

पूछो न मुझसे मेरा रस्ता, सफ़र ओ मंजिल
बस पाँव कांपते हैं, दिखता है दौड़ता हूँ

तस्वीर में भी धोखा, तक़रीर में भी झूठा
जानोगे मुझे कैसे, किरदार ओढ़ता हूँ

तस्वीर लेके अपनी दर दर भटक रहा हूँ
खुद में कहीं छिपा हूँ, दुनिया में ढूढता हूँ

उस दिन तेरी नज़र से देखा था जिसे मैंने
वो कौन हमशकल था, मैं नाम पूछता हूँ.

शाम-सुबह

है शाम सी सुबह तो क्या
उजाला कम ही अच्छा है
ये चुभता भी नहीं आखों में
और ख्वाब के गॉगल पहनने की ज़रुरत भी नहीं

जियो एक सांस में और ख़त्म हो
ये किस्सा है बड़ा बोझिल
क्यूं लंबा खीचना इतना
जो सुन ले बोर हो जाए, जिए जो, वो सज़ा भुगते

भरे हैं याद के गोदाम पहले ही
छांटने बीनने का भी वक़्त नहीं
कहाँ रखोगे जो लम्हे और लाये
गठरियाँ लादकर ये पीठ पर घूमोगे कब तक

होंठ थक गए मुस्कुराकर
आँख रोकर सूख गयी
इंसान हो या ड्रामे का किरदार कोई
इक उम्र है जज्बात की भी, बुढ़ाता जिस्म ही है क्या!

पोर्ट्रेट

ज़िन्दगी मेरी कोई कविता अधूरी सी
ख्वाहिशें जैसे कि हों बिन सीढियों की छत
और झील भर आंसूं में दो उम्मीद की बतखें

वक़्त की बारिश ने सारे रंग बहा डाले
बदशकल सा शख्स आईने में दिखता है
तुम जो लौटोगे मुझे पहचान लोगे ना

धूल सी यादें जमा हैं फर्श पर मेरी
पैर छपते हैं मैं इनसे जब गुजरता हूँ
कल रात फिर कदमों से एक कविता लिखी मैंने.

कविता की रात

उसे इतना कुछ कहना था कि
उस रात कविता लिखता ही चला गया
स्याही ख़त्म हुई तो आसुओं से लिखा
फिर रक्त का इस्तेमाल हुआ
कागज़ ख़त्म हुआ तो उसने खुद पर कवितायें लिख दीं
अपने यादों और सपनों को कविताओं से पाट दिया
हर दृश्य हर तस्वीर जो याद आयी उसे कविताओं में डुबो दिया
और लिखते लिखते जब वो खाली हो गया
उसने अपनी कुछ कवितायें बिछाईं
और बाकी की ओढ़कर सो गया
सुबह लोगों को फर्श पर कविताओं की तीन परतें मिली
पुलिस परेशान रही कि कविताओं का पोस्टमार्टम कैसे हो.

हॉरोस्कोप

बादलों से भरी एक खूबसूरत शाम में
छत पर अकेला टहलता हुआ
मैं बुनता हूँ ख़्वाबों की एक सतरंगी रस्सी
और बाँध लेता हूँ अपने पैरों से
बाद में उसी रस्सी का दूसरा सिरा
जा फसेगा घड़ी की सुईयों में !

गर्मियों की एक वीरान दोपहर में
अपने कमरे में औंधे मुंह लेटा हुआ
मैं पढता हूँ एक पुरानी किताब
जिसके एक पन्ने के मुड़े हुए कोने से निकलकर
एक किरदार घुस जाता है मेरे भीतर
मुझे जीवन भर इसके डायलाग दोहराने होंगे !

स्कूल से कोचिंग के रास्ते में
साइकिल के पैडल मारता हुआ
मैं लिखता हूँ उसे एक खयाली ख़त
फिर उसे चबा जाता हूँ सबसे छुपाने के लिए
मैं जीवन भर इसके टुकड़े उगलकर
बनाता रहूंगा नयी नयी कवितायें !

कबाड़खाना

जिन्दगी के कबाड़खाने में जमा होते रहते हैं
टूटे फूटे सपने, उधडी हुई उम्मीदें और यादों के मकड़जाल
जिन्हें साफ़ करने की न तो मुझे हिम्मत है और न वक़्त
अग्रीमेंट अभी लंबा है यहाँ पर मेरा
और कोई दूसरा ठिकाना भी नहीं रहने का
जैसे तैसे हर रात सरकाता हूँ ख़्वाबों का कबाड़
और थोड़ी जगह बन जाती है बमुश्किल सोने की
और सुबह होते ही कूड़े से भरी मेज़ पर जम जाता हूँ
उम्मीदों का फटा हुआ लूडो लेकर
एक खारी कॉफ़ी पीता हुआ मैं करता हूँ इंतज़ार
सुबह के शाम और शाम के रात होने का
मैंने कपड़े नहीं बदले महीनों से और नहाया भी नहीं
या शायद सालों से ठीक से याद नहीं
कैलेण्डर पर जमा हैं धूल की परतें
कुछ धुंधला सा दिखता है जो बहुत गौर से देखो
और इतना गौर करने की मेरे पास कुछ वज़ह भी नहीं
घड़ी भी बंद है घर की न जाने कब से
मैंने कई बार सेल बदले मशीन बदली खोला बांधा भी इसे
पर सुईयां हिलती ही नहीं, अड़ियल हैं, जमी बैठी हैं
जहां थम गयी थीं एक दिन अचानक यूं ही चलते चलते !

यात्रा

जीवन बिखरा है
हमारे क़दमों के दरम्यान कहीं
टुकडा टुकडा मिलता है
रास्ते के तीखे मोड़ों पे
अलग अलग नामों से शक्लों से
सम्मोहित करता है
रचता है मायाजाल हसीं ख़्वाबों के
किरदार बुनता है रूमानी कहानी जैसे
और हममें पिरो देता है किरदार के धागे सारे
फिर जादू के धागों में हम फसे फसे चलते हैं
पाते हैं खोते हैं हँसते हैं रोते हैं
और यादों के जो बादल हैं
वो हर रोज़ घने होते हैं
सूनसान रस्ते के एक बोझिल मोड़ पे
कोरे और बेनाम मील के पत्थर पर सुस्ताते हुए
हम अपनी घड़ियाँ सूरज से मिलाते हैं
और लगाते हैं ख़्वाबों और साँसों का हिसाब
ज़ख़्मी पैर इनकार कर देते हैं आगे बढ़ने से
और हम लौटना चाहते हैं कहीं पीछे
छूटे हाथों के सिरे ढूढने के लिए
जो कि मुमकिन नहीं
जादू के आंसू रोते हैं कपडे भिगोते हैं
गीले कपड़ों में ठिठुरते हुए
हर लम्हा घिरते अँधेरे के बीच
बादलों की बिजली की चमक में
हारकर हम फिर आगे बढ़ते हैं
जीवन को टुकडा टुकडा करके
पीछे बहुत पीछे छोड़ देने के लिए.

भूत

जब मैं छोटा था
मुझे अँधेरे से डर लगता था
छत पर अकेला रह जाता या
जब किसी सुनसान रास्ते से गुज़रता 
बेवजह ही डर जाता
तेज क़दमों से चलता
और गलती से भी पीछे मुड़ कर नहीं देखता
पता नहीं किस अनदेखी चीज़ का डर था
बिना पैरों वाले भूत का किस्सा सुना था कहीं 
जो रेलवे ट्रैक पर रहता था
और आने जाने वालों से कभी बीडी
तो कभी माचिस माँगता था
मैं छोटा था, मेरे पास न बीडी थी न माचिस
इसीलिये ज़्यादा डरता था
जब रात गए भूत को तलब लगती
बिना पैरों के चलता हुआ
मेरे सपने में आ जाता
फिर मैं आधी रात को
पसीने में भीगा हुआ खुद को समझाता
कि भूत वूत कुछ नहीं होता
और सपने कभी सच नहीं होते
पर फिर भी कई साल तक यूं ही बेवज़ह डरता रहा
पिछले कुछ वक़्त से देख रहा हूँ
वो डर फिर से लौट आया है
किसी भी हाल में मुड़कर नहीं देखना चाहता अब मैं
कभी नज़र पड़ जाए अगर पीछे तो काँप उठता हूँ
साँसे बेलगाम रहती हैं देर तक
ज़ल्दी से सब भूल कर आगे भागना चाहता हूँ
और इस बार गज़ब ये है
कि पैर तो चलते हैं मगर मैं वहीं अटका रहता हूँ
और बिना पैरों का भूत
मेरे एकदम करीब तक पहुच जाता है
अब जब फिर से यकीन होने लगा है
कि सपने कभी सच नहीं होते
काश मैंने कभी भूत न देखा होता
और खुद को ये भी समझा पाता
कि भूत वूत कुछ भी नहीं होता.

वहाँ सपने उगेंगे

जब थमेगा शोर
उठेंगे शान्ति के अंकुर
बड़ी रोशन सुबह महकेगी
उजाला होगा स्थिर सा
हवा में एक अजब
उम्मीद की खुशबू बहेगी
दूर आकाश में छिटके हुए
बादल में बिखरेंगी
सुनहरी सूर्य की किरणें
वहाँ सपने उगेंगे सात रंग के.

शतरंज का एक प्यादा

जब से जागा है वो, बहुत हैरान है
ये काला सफ़ेद बोर्ड उसे अब अच्छा नहीं लगता
न ही अपनी ये घिसी पिटी सी चाल
यकीनन अब वो आजिज़ आ चुका है इस खेल से
उसका ज़रा भी मन नहीं लगता यहाँ अब
उबासियाँ लेता है दिन भर
खाली बैठा आकाश में बादलों को उड़ता देखता है
और अभी दो चालों के बीच के खाली वक़्त में
वो सोच रहा है की कब वो पिटे
और बाहर निकले इस मनहूस बोर्ड से
फिर जब उसकी ओर किसी का ख्याल नहीं होगा
वो इस बोर्ड से इतना दूर चला जाएगा
कि उसे दूसरी बाजी के लिए नहीं खोजा जा सकेगा
फिर वो अपने लिए एक ऐसी दुनिया तलाशेगा
जहां कोई काले सफ़ेद खाने नहीं होंगे
और जहां वो अपने मन की चालें चल सकेगा.

प्रतिरोध

मैं हैरान हूँ
मेरे कैलेण्डर से कुछ साल गायब हैं
पता नहीं चोरी हुई, लूट हुई या मैं खुद ही कहीं भूल आया
पूरे के पूरे साल गायब हैं
एक भी हफ्ता नहीं, एक भी दिन नहीं
एक भी कहानी नहीं, एक भी किस्सा नहीं
सबकुछ गायब है
और अब जब मुझे मालूम पडा है
मैं पीछे जाकर ढूढना चाहता हूँ कुछ दूर
कुछ दूर क्या सदियों पीछे जाना पड़े तो भी चला जाऊं
पर वक्त मेरा रास्ता रोके खडा है
वो कुछ नहीं सुनता
बार बार मुझे वन वे वाला बोर्ड दिखाता है
वो मुझे धक्का देकर खींचता है आगे
और इस बीच सड़क पर गड़े मेरे पाँव के पंजे निशान बनाते चले जाते हैं
मुझे मालूम है मैं कभी वक्त से नहीं जीत पाउँगा
पर मुझे उम्मीद है की वो खोये हुए साल भी मुझे तलाश रहे होंगे
और जब वो मुझे ढूँढने निकलेंगे
ये निशान उन्हें मेरा रास्ता बताएँगे
इसीलिये सब जानकर भी मैं ये प्रतिरोध बंद नहीं करता
दरअसल, ये निशान ही अब मेरी आख़िरी उम्मीद हैं.

बताओ इससे मुश्किल क्या

ये साला झूठ की दुनिया में, गहरे तक धंसा होना
और आँखें खुली होना, बताओ इससे मुश्किल क्या

देखना खुद को ख़तम होते, खुदी का सर कलम होते
और उफ़ तक नहीं करना, बताओ इससे मुश्किल क्या

वो सर पीछे मुड़े तो भी, नज़र आगे पड़े तो भी
सभी कुछ एक जैसा स्याह, बताओ इससे मुश्किल क्या

न मुझमें मैं, न तुझमे तू, न इसमें ये, न उसमें वो,
नाम झूठे शकल झूठी, बताओ इससे मुश्किल क्या.

नया क्या है ?

सूरज के डूबने में
परछाई छूटने में
तारों के टूटने में

बादलों के रूठने में
झीलों के सूखने में
काटों को चूमने में

मिलने में छूटने में
आसुओं के फूटने में
फसलों के डूबने में

रोशनी के हारने में
और जोर मारने में
अंत को पुकारने में.

मीटर

अँधेरे लेने आये थे
मौत का ऑटोरिक्शा लेकर
साँसों का मीटर चालू था
वेटिंग चार्ज बहुत महँगा था
बोले कार्ड नहीं लेते है
आंसू कैश चाहिए थे बस
लाख बहाने काटे उसने
पाऊच ढूंढा वालेट ढूंढा
एटीएम के चक्कर काटे
उसके सब खाते खाली थे !

सवाल

साँसों के ख़त्म होने और समय के बह जाने के बाद
जब हम रेत पर पड़े निशानों की तरह बेजान पड़े होंगे
क्या हमारी यादें आपस में बात करेंगी
जैसे हमारे सपने आपस में बतियाते थे.

जंग-ए-उम्मीद

ये सियाही से नहा लथपथ हुई
बदबू भरी बदरंग रूहें
अभी ज़िंदा हैं थोड़ी सी
कहीं कुछ सांस तो अटकी सी है
कालिखों में घूमती हैं
ग्रहण के काले पलों में
रोशनी को ढूंढती हैं
बारिशों के दिन नहायेंगी
धुलेंगी चमक जायेंगी
अभी भी सोचती हैं
ख्वाब की उम्मीद से हैं
सूरज का रस्ता तक रही हैं
एक दूसरे का हाथ थामे हैं
आहिस्ता चल रही हैं
जमीं पर दलदल भी है
कुछ पैर धसते जा रहे हैं
तेज चलना है सुना है
भेड़िये भी आ रहे हैं
उम्मीद की ये जंग बस
सदियों से यूं ही चल रही है
हर रूह में इक रोशनी है
हर रूह खुद ही जल रही है
फिर भी कहीं खोया है सूरज
बादल भी कुछ सुनता नहीं है
कुछ तो करिश्मा है मगर
कि काफिला थमता नहीं है
आगे कहीं कुछ जीत सा
होगा मगर दिखता नहीं है
घटती हैं सासें हर कदम
पर हौसला घटता नहीं है.

नोस्टाल्जिया

वो जाती हुई सी धूप का एक बड़ा टुकड़ा
हम छोड़ आये थे जो उस दिन शाम में
दिल चाहता है, लौट जाऊं, ढूंढ लाऊँ

जो रखे थे किसी छूटी हुई बुनियाद पर
चाय के दो कप और सुस्ताये से लम्हे
फिर से वहीं बैठूं, अधूरा दिन बिताऊँ

वही रस्ते जो हमने पैर से खींचे थे खुद ही
वही रिश्ते जो बस पहली दफा सुलगाये थे
मैं फिर से कश भरूँ ऐसा, कि रस्ते भूल जाऊँ.

पतंगें

पतंगें जो उड़ रही थी
ख्वाब की डोरी पे सध के
आसमां को जोडती थीं
दूर तारे तोड़ती थीं
दांव पेचों में कटी हैं
हाथ बस डोरें बची हैं
दो पतंगें दो सिरे थे
दोनों तरफ इंसान थे !

राईटर्स ब्लॉक

कभी कभी जब ज़िन्दगी टीवी सीरिअल बन जाती है
और राईटर्स ब्लॉक से जूझ रहा लेखक
एक अच्छे मोड़ के इंतज़ार में
यूं ही दिन रात कलम घिसता है
बीतते जाते हैं एपिसोड पर एपिसोड
दर्शक बोर हो जाते हैं और किरदार चिडचिडे
सौ बार दोहराए जाते हैं घिसे पिटे डायलॉग्स
कैमरा दोहराता है अलग अलग एंगल से
वही चेहरे वही एक्स्प्रेशंस
कुछ नया नहीं, कुछ बड़ा नहीं
और क्योंकि उधर राईटर रातें गला रहा है
तो हर लम्बे सीन के बाद ऐसा लगता है कुछ नया होगा
मगर बार बार टूटती है दर्शकों की उम्मीदें
और फिर हर बार ये ट्विस्ट रिपीट करता है खुद को
लेकिन नहीं आता कभी वो खूबसूरत मोड़
जिसका इंतज़ार है सबको
अब सवाल उठता है की लेखक कब हार माने
कब टूटे आख़िरी क्लाईमेक्स की उम्मीद
और कब ऐसा हो
कि एक दिन अचानक यूं ही चुपके से
कहानी खुद ही थककर सांस लेना बंद कर दे
और स्क्रीन पर दिखाई दे 'द एंड' का कार्ड.

डेढ़ चम्मच ख्वाब

जो ऐसा हो कि बारिश में हमारी रूह भीगी हो
और चाय की दरकार हो गरमागरम

इक अदरक की डली यादों सी कड़वी हो
तिरछी नज़र जितनी कोई इलाईची हो
कुछ डेढ़ चम्मच ख्वाब मीठा रंग लायें

भीगी हुई सीमेंट वाली बेंच भी हो
धूप में बूढ़े हुए से लाल रंग की
झुर्रियां धुलकर की जैसे चमक जाएँ

रास्ते भीगे हुए जो खीचते हों
कदम जिन पर फिसलते हों रुक न पाएं
धानी धुले पत्तों से आखें चौधियाएं

पेड़ की डाली से कुछ बूँदें गिरें
प्याले में बड़ी सोंधी सी इक खुशबू घुले
बचने की कोशिश हो की प्याला छलक जाए.