एक क्रांतिकथा

उनकी ज़िंदगी मौत से बदतर हो चली थी
हवायें ज़हरीली थीं
हर सांस के साथ थोड़ी थोड़ी मौत उतर जाती थी सीनों में
उनकी दुनिया अंधेरी थी
सूरज थक कर सो गया था आसमान में कहीं
बुजुर्गों की कहानियों में उन्होंने उजाले के बारे में सुना था
उन्होंने आज़ादी के बारे में भी सुना था
उन्होंने सपनों का नाम भी सुना था
बस नाम सुने थे, किस्से सुने थे
पता नहीं सच्चे थे या झूठे
उन्हें भगवान पर विश्वास था
क्योंकि वो खुद न तो कुछ करते थे
ना ही कर सकते थे
उनकी हर सफलता और असफलता के लिए
ईश्वर ही ज़िम्मेदार था

एक दिन जब वो अपनी बदकिस्मती, डर
और निराशा से बोर हो गए थे
किसी ने उन्हें क्रान्ति के बारे में बताया
उन्हें शुरुआत में अजीब लगा फिर
बच्चों के उकसाने पर कुछ लोग खड़े हो गए
उन्होंने सर पर कफ़न बाँध लिए
और दुश्मन को पराजित करने निकल पड़े

दुश्मन को ढूंढते ढूंढते वो
नदियाँ, सागर, पहाड़, रेगिस्तान सब पार कर गए
वो कभी हवा में तलवारे चलाते थे, कभी पत्थरों पर
कभी सागर की लहरों के टुकड़े करने की कोशिश करते थे
वो थके बिना आगे बढते जाते थे
और चीखकर इन्कलाब के नारे लगाते थे
उनका ईश्वर उनकी हालत देखकर चकित था

जब वो भारी क्रोध, आक्रोश और बदले की भावना से भरे
अपने दुश्मन को ढूंढ रहे थे,
उन्हें एक गुफा का पता मिला
वो एक गहरी गुफा में घुसे
ये गुफा बाहर की दुनिया से भी ज्यादा अंधेरी थी
कहीं ज्यादा डरावनी और भयावह
वो तलवारें और भाले चलाते भीतर घुसते गए
गुफा में कोई नहीं था सन्नाटे और अँधेरे के सिवा
वो इन्कलाब के नारे लगाते भीतर चले जाते थे

उन्होंने सुना था कि इसके भीतर ही रहता है उनका दुश्मन
जिसने कैद कर रखा है उनका सूरज, उनके सपने
उनकी आशाएँ उनकी आज़ादी
यहाँ तक पहुचते कई मर चुके थे
भूख से, प्यास से, निराशा से, डर से
और साथी क्रांतिकारियों के अँधेरे में चल रहे बर्छियों और भालों से
जो बचे थे एक दुसरे का हाथ थामे आगे बढते जा रहे थे
वो भी वापस लौट गए होते
लेकिन उन्हें पता था कि इतना दूर आने के बाद
अब वो घर नहीं लौट पायेंगे

वो अपने थके बुझे क़दमों से आगे बढते गए
गुफा सदियों लंबी प्रतीत होती थी
कहीं दूर दूर तक ओर छोर नहीं दिखता था
उनके मन में पीछे छूट गए अपने देश की
अपने परिवार की यादें थीं
इस निराशा, क्षोभ और साथी क्रांतिकारियों की मौत ने
उनका गुस्सा और बढ़ा दिया था
उनकी आखें अंगारों सी दहकने लगी थीं
अब उन्हें कोई डर न था
खोने के लिए भी कुछ नहीं बचा था

तभी सामने से उजाले का कुछ आभास हुआ
वो समझ गए थे कि गुफा का अंत निकट है
यानी दुश्मन अब पास था
अपने हथियार सम्हाल वो विद्युत गति से दौड पड़े
उनके जूतों के नीचे से चिंगारियां निकलीं
गुफा उन मुठ्ठी भर वीरों की कदम ताल से गूँज उठी
फिर से इन्कलाब के नारे लगे और धरती हिल पडी

लेकिन जैसे ही वो गुफा के सिरे पर पहुचे
उनके पैरों ताले जमीन खिसक गयी
गुफा के अंत में आईने लगे थे
जिन पर उन्ही का अक्स झिलमिला रहा था
वो हैरान थे क्या करें, दुश्मन सामने था
जिसे समाप्त करने के लिए उन्होंने ये लंबी यात्रा की थी
अपने देश, अपने परिवार को खो दिया था
उनके ढेरों साथी रास्ते में ही बलि चढ गए थे
इतना सब खोकर खाली हाथ कैसे लौट सकते थे
पर वो विस्मित थे कि किस पर हमला करें
आइनों पर या खुद पर

फैसला आसान था
उन्होंने आईने तोड़ दिए
और दुश्मन की मौत का जश्न मनाते हुए वापस लौट आये.