ख्वाहिशें

हर रात जब मैं बैठता हूँ एक खाली कैनवस लेकर
मन बावरा सा दौड़ता है सौ रंग बिखराता हुआ
और फिर वही तस्वीर दोहराती हैं ख़्वाबों की

मैं रोज सिहरता हूँ,सहम जाता हूँ, घबराता हूँ
वक़्त लगता है फिर से नॉर्मल होने में मुझे
मैं डरता हूँ किसी दिन नब्ज़ न थम जाए मेरी

अजब सी ख्वाहिशें हैं सालों से जमीं हैं मुझमें
वक़्त से, धूप से और गर्द से कुछ फर्क नहीं
ये मुझमें ऐसे काबिज़ हैं कि मेरी रूह हों.