कदमों के निशान

अपने ही क़दमों के निशान
अक्सर आ जाते हैं सपनों में
और जग पड़ता हूँ मैं बेचैन होकर
आईने के सामने बैठा रहता हूँ हैरान सा
कभी वो उचकता है तो कभी मैं
हमारी बराबरी नहीं हो पाती कभी
शाम भी घर आयी है तो अजीब ही
बडी लंबी, बोझिल और थकाऊ सी
हमने तो कुछ और ही सुना था
इसके बारे में
सुना सुनाया सब झूठ ही निकलता है
या फिर क्या पता किसी ने बता दिया हो इसे
कि मुझे दोपहर से प्यार था
बंद दरवाजा मुझ पर टकटकी लगाए है
कई दिन से
सैकड़ों सवाल लिये बैठा है
सड़कों पर चलता हूँ तो वो भी
बात करना चाहती हैं कुछ
मैं ज़ल्दी से निकल जाता हूँ
सबको अवॉइड करके
कह देता हूँ ज़ल्दी में हूँ
बहुत ज़ल्दी से भागता हूँ सबसे दूर
लेकिन पैरों के निशान दौडाते रहते हैं
जितना तेज भागता हूँ
उतनी ही तेज़ी से पीछे आते हैं
पता नहीं क्या चाहिए सालों को.